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	<title>Hindi &#8211; Conquer The Success</title>
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		<title>रोगों का कारण और निवारण</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Dr Pankaj Gupta]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Sep 2018 04:57:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Health]]></category>
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<p>“सफलता पर विजय” की इस अद्भुत यात्रा में आपका स्वागत है| हम एक ऐसी यात्रा पर हैं, जिसमे हम जान रहे हैं कि हम जीवन में कैसे स्वस्थ हों और साथ ही कैसे हमारे सम्बन्ध मधुर हों, बुद्धि तीक्षण हो, ह्रदय प्रेमल हो और चेतना ध्यानस्थ हो, जिससे हम जीवन में एक आनंदमय सफलता, एक नाचती हुई सफलता का अनुभव कर सकें|<br />
अब तक हमने जाना कि बिना आनंद के सफलता अधूरी है और बिना सफलता के आनंद अधूरा है| एक पूर्ण जीवन वही है जिसमें सफलता और आनंद दोनों प्रचुर मात्रा में हैं| इन दोनो को जीवन में हांसिल करने के लिए चेतना की यात्रा, बहार और भीतर, पूर्णतया सहज और सुगम होनी चाहिए| हमने यह भी जाना कि जहाँ पीड़ा है, तनाव है, चिंता है, कष्ट है वहां हमारी चेतना अटक जाती है और फिर न हम जीवन में सफल हो पाते हैं और न ही आनंदित|<br />
पिछले अंक में हमने जाना कि चेतना कि यात्रा में पहला अटकाव हैं “हमारे सम्बन्ध”| हमने जाना कि किन कारणों से हमारे सम्बन्ध खराब होते है और हम क्या करें कि हमारे सम्बन्ध मधुर हों| मैं आशा करता हूँ कि आप अपने जीवन में परिवर्तन लाये होंगे और मुझे विशवास है कि आपके सम्बन्ध मधुर होने शुरू हो गए होंगे|<br />
इस लेख में हम दुसरे अटकाव को समझेंगे| हमारी चेतना की सहज यात्रा में दूसरा अटकाव है “हमारा शरीर”| हम यह जानेंगे कि हम बिमार क्यों होते हैं और स्वस्थ कैसे रह सकते हैं| यदि हमें कोई रोग हो गया है, तो कौन सी चिकित्सा पद्धति से वह ठीक हो सकता है|<br />
अधिकतर लोग स्वस्थ शरीर लेकर पैदा होते हैं| हमारा शरीर प्रकृति की एक ऐसी अनुपम कृति है जिसमें रोगों से लड़ने की अद्भुत सामर्थ है| हमारा शरीर रोगों से लड़ भी सकता है, और यदि किसी कारणवश रोगग्रस्त हो जाए, तो स्वयं ही अपना उपचार भी कर सकता है| उदाहरण के लिए, जब ठंड पड़ती है तो हमारे शरीर में कंपन होनी शुरू हो जाती है और उस कंपन से उर्जा पैदा होती है जिससे हमारा शरीर एक निश्चित तापमान पर आ जाता है| गर्मी के मौसम में शरीर से पसीना निकलना शुरू हो जाता है जिससे शरीर ठंडा होता है और निश्चित तापमान पर आ जाता है| चोट लगने पर जब पस पड़ती है तो वह इन्फेक्शन से बचाती है| रात को जब हम सोते हैं तो जो कोशिकाए (सेल्स) दिन में नष्ट हो जाती हैं उनको शरीर बाहर फैंक देता है और उनकी जगह नई कोशिकाए जन्म ले लेती हैं, भोजन पचता है इत्यादी| अगली सुबह हम फिर तरोताजा होकर उठते हैं|<br />
यह बहुत आश्चर्य की बात है कि फिर भी हम बिमार कैसे हो जाते है?<br />
हम समाज में रह रहे हैं और अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से इस जगत के साथ जुड़े हैं| सुन कर, देख कर, सूंघ कर, स्पर्श करके और स्वाद ले कर हम इस जगत में होने वाली घटनाओं को जान पाते हैं| इन सभी इंद्रियों से एकत्रित की गयी सूचना हमारे चेतन मन में जाती है| हमारे चेतन मन का काम है विचार करना, सही गलत में भेद करना, निर्णय लेना| यह चेतन मन गहरे में हमारे अवचेतन मन से जुड़ा होता है| हमारे अवचेतन मन में भावनाएं जैसे प्रेम, क्रोध, घृणा आदि; हमारे संस्कार, भय, इच्छायें, कामनाएं इत्यादी होती हैं|<br />
तो बाहर की घटनाएं हमारी इन्द्रियों के माध्यम से हमारे चेतन मन में आती हैं; वहां पर हमारी विचार कि प्रक्रीया शुरू हो जाती है; और फिर विचार से भावनायें सक्रिय हो जाती हैं| इन्ही भावनाओं और विचारों के आधार पर हम जगत में व्यवहार करते हैं|<br />
एक उदाहरण से समझते हैं, मान लीजिये दिन में आपकी आपके मित्र से नोक झोंक हो गयी| उसने आपको कुछ बुरा भला कहा दिया| जब आप रात को बिस्तर पर सोने के लिए जायेंगे, तो मन में वही विचार घुमते रहेंगे कि उसने मेरे साथ गलत किया| उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था| इन विचारों से हो सकता है क्रोध की भावना सक्रिय हो जाए| अब क्रोध में आप विचार करेंगे कि मैं उसको दिखा कर रहूँगा कि मैं कौन हूँ| मैं उससे बदला ले कर रहूँगा| हमारे मन को एक चिंता, एक तनाव ने पकड़ लिया|<br />
जैसे ही हमारा मन चिंता, परेशानी या तनाव से ग्रसित होता है तो इसका सीधा असर हमारी सांसों पर आना शुरू हो जाता है| हमारी सांसे तेज चलने लगती है और छोटी हो जाती है| आपने देखा होगा कि एक छोटा बच्चा जब सो रहा होता है तो सांस लेते समय उसकी नाभि ऊपर और नीचे उठती है अर्थात वह लम्बी, धीमी और गहरी सांस ले रहा है| परंतु तनाव की स्थिति में सांस लेते समय हमारी सिर्फ छाती ही ऊपर नीचे होती है, पेट नहीं| अर्थात हमारी सांस तेज, छोटी और उथली होने लगती है|<br />
जैसे ही हमारी सांस प्रभावित होती है, तेज, छोटी और उथली हो जाती है, तो उसका असर हमारी जीवनी-शक्ति पर पड़ना शुरू हो जाता है| यह जीवनी शक्ति साँसों के माध्यम से ही हमारे भीतर आती है | साँसों के अस्त व्यस्त होने से हमारी जीवनी शक्ति में कमी आनी शुरू हो जाती है|<br />
हमारी जीवनी-शक्ति का सीधा प्रभाव हमारे तत्वों पर पड़ना शुरू हो जाता है| हमारा शरीर पांच तत्वों से बना है –अग्नि, वायु, जल, आकाश और पृथ्वी| जैसे ही हमारी जीवनी शक्ति प्रभावित होती है, हमारे तत्व असंतुलित हो जाते हैं|<br />
पांच तत्व हमारे नीचे के पांच चक्रों के साथ जुड़े है| जैसे ही तत्व असंतुलित होते हैं तो इनका प्रभाव हमारे चक्रों पर पड़ता है|<br />
हर चक्र हमारे शारीर की एक एक ग्रंथी (ग्लैंड) के साथ जुड़ा है| ग्रंथियों का काम है रक्त में सही मात्र में कुछ रसायन मिलाना जो हमारे शरीर को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं| यदि शारीर में इन रसायनों की मात्रा में असंतुलन आ जाता है तो शारीर में रोग के लक्षण आ जाते हैं| जैसे शारीर का तापमान कम या ज्यादा होना, वजन कम या ज्यादा होना, दर्द, भूख कम या ज्यादा होना, रक्तचाप कम या ज्यादा होना, नींद न आना इत्यादि|<br />
इन लक्षणों को हम बिमारी कहते है| इन बीमारियों के इलाज के लिए हम डॉक्टर से मिलते हैं | डॉक्टर हमें कुछ दवाइयां देते हैं| दवाइयों के द्वारा रसायन हमारे शरीर में जाते हैं और रोग के लक्षण दूर हो जाते हैं| हम स्वयं को स्वस्थ महसूस करने लगते हैं|<br />
दवाइयों के माध्यम से जो रसायन हम शरीर में लेते हैं उनसे स्वस्थ तो जरूर महसूस करते हैं परन्तु उनके दुष्परिणाम भी हमारे शरीर पर आने लगते हैं | फिर उन दुश्परिणामों को दूर करने के लिए हम और दवाइयों का सहारा लेते हैं| आज ३0 – ३५ वर्ष तक आते आते, बहुत से लोगों को दिन में ८ से १0 गोलिया खानी पड़ती हैं|<br />
अब हम अपने उदाहरण पर वापस आते हैं| हमारी मित्र से नोक झोंक हुई, रात को वही विचार हमारे मन में घूमने लगे, मन में क्रोध आया और उससे बदला लेने की भावना सक्रिय होने लगी| तनाव कि स्थिति बन गयी| इससे हमे नींद नहीं आएगी| नींद में, जैसा हमने ऊपर जाना, शरीर का उपचार होता है, भोजन पचता है इत्यादी| अब नींद न आने से भोजन ठीक से नहीं पचेगा| जिसके कारण हमे गैस और एसिडिटी होनी शुरू हो जायेगी| क्रोध में हमारा रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) बढ़ जाता है|<br />
अपने जीवन में देखें तो रोज़ न जाने कितने लोग कितने जख्म देते हैं | और जैसे जैसे उम्र बढती है, तो इतने जख्म इकट्ठे हो जाते हैं कि हमारी आत्मा तक छलनी हो जाती है| परिणामस्वरूप, हम विचारों और नकारात्मक भावनायों (क्रोध, लाचारी, ग्लानी आदि) से घिर जाते हैं, जिससे विभिन्न रोग हमारे शरीर को आ घेरते हैं | आज ज्यादातर लोग नींद न आना, अपच, गैस, एसिडिटी, रक्तचाप आदि बीमारियों से ग्रसित हैं | और रोज़ इनकी दवाइयां लेते हैं|<br />
थोडा विचार करें तो हम समझ सकते हैं कि बिमारी का कारण मन में था, हमारी बदला लेने की भावना, हमारा क्रोध; परन्तु हमनें इलाज किया अपने शरीर का, नींद न आने का, रक्तचाप का, इत्यादि| बिमारी की जड़ तो हमारे मन में वैसी की वैसी ही है| क्या यह ऐसा न हुआ कि हम चाहते तो हैं पेड़ काटना परन्तु रोज पत्ते तोड़ कर प्रसन्न हो जाते हैं कि हमने पेड़ छोटा कर दिया परन्तु जड़ को नहीं काट रहे| और जब हम पत्ते तोड़ते हैं, तो वह कलम करने का काम करता है; यानी अगले दिन और ज्यादा पत्ते निकलेंगे | ऐसा ही हमारे साथ हो रहा है | अगर कल हम ५ गोलिया खाते थे, तो आज ८ खानी पड़ रही हैं और भविष्य में गोलियों की मात्रा बढती जायेगी | क्या हम दवा से स्वस्थ हो रहे हैं या अस्वस्थ?<br />
आपको जान कर आश्चर्य होगा कि लगभग ९०% बीमारियाँ मनो-शारीरिक है, अर्थात जिनका कारण मन में है और उनके लक्षण शरीर पर दिखते हैं | और हम मन को छोड़ कर, शरीर का इलाज करते हैं और मानते हैं कि हम स्वस्थ हो रहे हैं |<br />
तो प्रश्न उठता है कि क्या यह संभव है कि हम मन पर ही इलाज कर सकें ताकि हम जड़ से ही बिमारी के कारण को सदा के लिए मिटा सकें |<br />
जी हाँ, आज यह बिल्कुल संभव है| आज बहुत सी चिकित्सपद्धातियाँ हैं जो मन पर ही इलाज करती हैं और कोई दवाई भी नहीं लेनी पड़ती | अतः हम दवाइयों के दुश्परियाम से भी बच जाते हैं |और रोग के कारण को जड़ से समाप्त कर देते हैं| जीवन सफलता और आनंद की ओर अग्रसर होने लगता है| स्वास्थ्य तो हमारा ठीक रहता ही है, साथ में हज़ारो रूपय, जो हम दवाइयों में खर्चते हैं, वह भी बच जाते हैं |<br />
इनकी चर्चा हम अगले लेख में करेंगे| अगर आपके कोई प्रश्न हैं तो आप संपर्क कर सकते हैं|<br />
Dr. Pankaj Gupta</p>
</div><div class="fusion-clearfix"></div></div></div></div></div>
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		<title>सफलता का पहला अटकाव: संबंधों में तनाव</title>
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		<dc:creator><![CDATA[conquerthesuccess]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Sep 2018 11:27:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पिछले लेख “सफलता पर विजय” में हमने जाना कि हम सब सफल होना चाहते हैं जिसके लिए हमारे चेतना तो संसार में यात्रा करनी होती है अर्थात हमें कर्म के जगत में उतरना होता है| दूसरा हमने जाना कि आनंद हमारे भीतर है जिसके लिए चेतना को स्वयं के भीतर यात्रा करनी होती है, ध्यान  [...]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले लेख “सफलता पर विजय” में हमने जाना कि हम सब सफल होना चाहते हैं जिसके लिए हमारे चेतना तो संसार में यात्रा करनी होती है अर्थात हमें कर्म के जगत में उतरना होता है| दूसरा हमने जाना कि आनंद हमारे भीतर है जिसके लिए चेतना को स्वयं के भीतर यात्रा करनी होती है, ध्यान में डूबना होता है| सफलता और आनंद; जीवन रुपी पक्षी के दो पंखों के सामान हैं और किसी एक के भी कट जाने पर जीवन का पक्षी उड़ान नहीं भर सकता और तड़पता रहता है| सफलता ओर आनंद को जीवन में बनाए रखने के लिए चेतना की बाहर और भीतर की यात्रा बहुत सुगमता से होनी चाहिए| हमने यह भी जाना कि जहाँ पीड़ा है, तनाव है, चिंता है वहीँ हमारी चेतना अटक जाती है और फिर न हम सफल हो पाते हैं और न ही आनंदित| पहले पड़ाव के रूप में हमने जाना कि हमारे तनावग्रस्त सम्बन्ध है| जब संबंधों से माधुर्यता कम होने लगती है तो हमारी सारी चेतना, हमारे सारे विचार उन्ही संबंधो पर अटक जाते है और फिर न काम में मन लगता है और न नींद ही ठीक से आती है|</p>
<p><strong>इस लेख में हम जानेगे कि हमारे संबंधों में तनाव और कटुता क्यूँ आती है; और हम क्या कर सकते हैं कि हमारे संबध दिन प्रतिदिन मधुर से मधुरतम बनते चले जाएँ|</strong></p>
<p><strong><u>संबंधों में कडवाहट आने का मुख्य कारण </u></strong></p>
<p>सम्बन्धों में कड़वाहट का मुख्य कारण है:</p>
<p><strong><em><u>हमारा यह मानना कि मेरी सोच ही सही है और जो मेरी तरह नहीं सोच रहा, जो मुझसे भिन्न सोचता है, वह गलत है|</u></em></strong></p>
<p>एक उदाहरण से समझते हैं| मेरे पास काउन्सलिंग के लिए बहुत लोग आते हैं| पत्नी कहती है मैं अपने पति से प्रेम करती हूँ, इनकी चिंता करती हूँ इसलिए इनसे फ़ोन करके इनका हाल चाल पूछती हूँ| इन्होंने समय पर खाना खाया या नहीं खाया; शाम को कितने बजे घर आयेंगे; शाम को खाने में क्या बनाऊं इत्यादि इत्यादि| यह सब जानने कि लिए मैं इन्हें फ़ोन करती हूँ| मुझे इनकी फ़िक्र है, इनसे प्रेम है लेकिन ये तो इसको समझते ही नहीं हैं| बस मुझे सारा दिन  डांटते रहते हैं| नौकरों की तरह सारा दिन घर का काम करो और इनकी डांट खाओ| डॉक्टर साहब, आप ही इन्हें समझाइये|</p>
<p>जब पति से बात करते हैं, तो वो कहते हैं कि मेरी पत्नी सारा दिन मुझे ऑफिस में फ़ोन करके परेशान करती है| प्रेम तो सिर्फ दिखावा है, असल में वह मुझ पर शक करती है कि मैं ऑफिस में कहीं किसी लड़की के साथ तो नहीं बैठा हूँ| इसलिए बार बार फ़ोन करके पता करती है| हर बार पूछती है “क्या कर रहे हो?” ऑफिस में हूँ, काम ही कर रहा हूँ| ऑफिस में खाली बैठने की कोई तनख्वाह नहीं देता| इनको क्या पता ऑफिस में हम कितने तनाव में रहते हैं| इनका जब मन करता है फ़ोन कर देती है| फ़ोन न उठाओ तो शक कि किसी लड़की के साथ होगे इसलिए मेरा फ़ोन नहीं उठाया| ऑफिस में कई बार व्यस्त होने के कारण फ़ोन नहीं उठा पाता| घर पहुँचते ही लड़ना| सारा दिन ऑफिस में मेहनत करो और घर आओ तो वहाँ भी सुकून नहीं| शिकायते और बस सारा दिन शिकायतें|</p>
<p>दोनों की नजर में दूसरा गलत है| पत्नी को लगता है कि मेरा पति मेरे प्यार कि क़द्र नहीं करता और पति को लगता है कि मेरी पत्नी मुझ पर शक करती है और मुझे परेशान करती है| अब दोनों के मन में एक दुसरे के प्रति प्रेम और सम्मान कम होने लगता है और क्रोध बढ़ने लगता है| और जब क्रोध में व्यवहार करते हैं, तो सम्बन्ध दिन प्रतिदिन कटु और कटु होते जाते हैं| जीवन नरक बन जाता है| रोज लड़ाई झगडा|</p>
<p>याद करें जब नयी नयी शादी होती है या नया नया प्रेम होता है तो मनोरंजन के लिए दोनों ऐसी जगह जाते हैं जहां कोई और न हो और आपस में खूब सारी बातें कर सकें| परन्तु कुछ वर्षों पश्चात, मनोरंजन के लिए सिर्फ सिनेमा हाल| क्योंकि वहां साथ होने का अहसास भी है और आपस में बात करने की सुविधा भी नहीं है|</p>
<p>बात करने के लिए कोई भी विषय नहीं रहता| जब भी बात करते हैं वह झगडे में ही बदल जाती है| कुछ समय बाद या तो दोनों एक घर में दो अजनबियों की तरह रहने लगते हैं या फिर तलाक के लिए वर्षों अदालत के चक्कर लगाते रहते हैं| अपना कीमती समय, धन और सारी शक्ति एक दुसरे को बर्बाद करने में लगा देते हैं|</p>
<p>यह किसी एक घर की नहीं बल्कि लगभग हर घर की कहानी है| क्यूंकि मैं एक काउंसलर हूँ अतः, यह बात मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ|</p>
<p>अब आप विचार कीजिये कि दोनों में से कौन सही है और कौन गलत?</p>
<p>असल में दोनों का व्यक्तित्व अलग है, पर्सनालिटी टाइप अलग है| कोई दुसरे को परेशान करने के लिए व्यवहार नहीं कर रहा बल्कि अपने व्यक्तित्व के अनुसार, अपनी ओर से बहुत ही सहज व्यवहार कर रहा है| परन्तु क्यूंकि दोनों का व्यक्तित्व अलग है, इसलिए उसको दुसरे का व्यावहार अपने से भिन्न होने के कारण गलत लग रहा है|</p>
<p>इसलिए अपने संबंधों को मधुर बनाने के लिए एक दुसरे की भिन्नता का सम्मान करें| घर में एक दुसरे के साथ खुल कर बातचीत करें| दुसरे के नजरिये को समझने की कोशिश करें|</p>
<p>मेरे पास जब काउन्सलिंग के लिए पति पत्नी आते हैं तो मैं उनसे अक्सर कहता हूँ कि आपके शरीर भी भिन्न हैं परन्तु आपने एक दुसरे के शारीर को ग़लत नहीं कहा| बल्कि आप एक दुसरे के शरीर की भिन्न्ब्ता के कारण एक दुसरे की ओर आकर्षित हुए| इसी भिन्नता का उपयोग करते हुए आपने एक बच्चे को पैदा किया, एक सृजनात्मक कार्य किया, एक नए जीवन को जन्म दिया| इसी प्रकार यदि आप अपने विचारों की भिन्नता, अपने व्यवहारों की भिन्नता का भी सम्मान करेंगे, तो क्या यह संभव नहीं कि आप मानसिक तल पर भी सृजनात्मक हो जाएँ| परन्तु दुर्भाग्यवश आप इन भिन्नताओं को दूसरों की गलतियों की तरह देखते हैं और विध्वन्स्सत्मक रवैया अपनाते हैं और जीवन में दुःख, क्लेश और पीड़ा को भर लेते हैं|</p>
<p>आपको यह जानकार आश्चर्य होगा की हम बहुत जल्दी सही गलत का निर्णय कर देते हैं, दूसरों को प्रमाणपत्र भी दे देते हैं, न्यायाधीश बन जाते हैं| यानी हम तो यही मानते हैं कि हम सही हैं| अगर अपनी भाषा पर थोडा नजर डालेंगे तो स्पस्ट हो जाएगा| मान लीजिये आप कोई पिक्चर देखने गए हैं| आने के बाद आप क्या कहते हैं – यह पिक्चर अच्छी है अथवा यह पिक्चर बुरी है| हम कभी नहीं सोचते कि मैं कौन होता हूँ यह निर्णय करने वाला कि पिक्चर अच्छी है या बुरी| मैं तो सिर्फ अपने सम्बन्ध में ही वक्तव्य दे सकता हूँ| क्या यह बेहतर नहीं होगा कि मैं सिर्फ इतना कहूँ कि यह पिक्चर मुझे अच्छी लगी अथवा यह पिक्चर मुझे बुरी लगी| अगर हम थोडा गौर से देखे तो न जाने दिन में हम कितने निर्णय कर डालते हैं, हम न्यायाधीश बन जाते हैं, सब को प्रमाणपत्र देते रहते हैं| खाना अच्छा है, चाय बुरी बनी है, यह आदमी बुरा है, फलाना आदमी अच्छा है, फलाना पार्टी अच्छी है| और जब हम इस भाषा का प्रयोग करते हैं तो कहीं हमारे मन में गहरे में अपने से भिन्न विचार रखने वाला गलत लगने लगता है|</p>
<p>कुछ दिन प्रयोग करके देखिये| सिर्फ इतना ही कहें – मुझे भोजन अच्छा लगा क्यूंकि हो सकता है किसी दुसरे को यही भोजन अच्छा न लगे; मुझे चाय बुरी लगी, हो सकता है किसी दुसरे को यही चाय बहुत अच्छी लगे|</p>
<p>जब आप इस प्रकार की भाषा का उपयोग करेंगे, तो आप देखेंगे आपने गहरे अंतर्मन में दुसरे की भिन्नता को स्वीकार करने का सामर्थ्य आएगा|</p>
<p>धीरे धीरे जब आप दुसरे की भिन्नता का सम्मान करने लगेंगे, आपका मन दुसरे के प्रति प्रेम और सम्मान से भरना शुरू हो जाएगा और आप अनुभव करेंगे कि आपके व्यवहार में भी बदलाव आना शुरू हो गया है| और अंततः आप पायेंगे कि आपके संबंधों में माधुर्यता आने लगी है|</p>
<p>सम्बन्ध मधुर बनाने का एक सूत्र है</p>
<p><strong><em><u>दूसरा गलत नहीं है, वह मुझसे भिन्न है| और दुसरे की भिन्नता का सम्मान करें|</u></em></strong></p>
<p>आप अगर अपने चारों ओर नजर डाले तो आप देखेंगे प्रकृति विविध प्रकार की भिन्नताओं से भरी है| भिन्न प्रकार के फूल है, पेड़ हैं, पशु पक्षी हैं, मनुष्य हैं| अगर भिन्नता गलत होती तो प्रकृति भी एक ही प्रकार के फूल पैदा करती, एक ही फल होता, और एक से ही पेड़ पौधे होते|</p>
<p>सोचो ज़रा अगर प्रकृति में भिन्नता नहीं होती हो यह संसार कितना नीरस होता, कितना फीका होता, कितना बेरंग होता| प्रकृति भिन्नता का सम्मान करती है| हम भी दुसरे के विचारों की भिन्नता का सम्मान करें और अपने संबंधों को प्रेमल बनायें |</p>
<p>और जब आपके सम्बन्ध मधुर होंगे तो आपकी चेतना वहां नहीं अटकेगी और वह अपनी सफलता की यात्रा पर सुगमता से बाहर जा सकेगी और जब आप चाहेंगे आपकी चेतना अपने भीतर लौट सकेगी जहाँ आप आनंद अनुभव कर पायेंगे|</p>
<p>“सफलता पर विजय” 6 दिन का ट्रेनिंग कार्यक्रम है जिसमें आप आयें और जाने कि जीवन में कैसे सफल हों, और साथ ही कैसे हमारे सम्बन्ध मधुर हों, बुद्धि तीक्षण हो ह्रदय प्रेमल हो और आत्मा ध्यानस्थ हो| कैसे हमारे जीवन के पक्षी के दोनों पंख, सफलता और आनंद, मजबूत हों और कैसे वह ऊँची उड़ान पर निकल सके|</p>
<p>अगर आपके कोई प्रश्न हैं तो आप उन्हें भेज सकते हैं| अगले अंक में उन्हें लेने की कोशिश करेंगे|</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>डॉ. पंकज गुप्ता</p>
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		<title>सफलता पर विजय – सफलता और आनंद का अनोखा संगम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[conquerthesuccess]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Sep 2018 11:25:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
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					<description><![CDATA[आनंद हमारे भीतर है जीवन में हर पल हम ख़ुशी की तलाश करते हैं| जब हमारे पास धन होता है तो हम खुश होते हैं| जब हमारे पास पद होता है तो हम खुश होते हैं| जब हम सफल होते हैं तो हम खुश होते हैं| जब हमें सम्मान मिलता है, तो हम खुश होते  [...]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><u>आनंद हमारे भीतर है </u></strong></p>
<p>जीवन में हर पल हम ख़ुशी की तलाश करते हैं| जब हमारे पास धन होता है तो हम खुश होते हैं| जब हमारे पास पद होता है तो हम खुश होते हैं| जब हम सफल होते हैं तो हम खुश होते हैं| जब हमें सम्मान मिलता है, तो हम खुश होते हैं| सामान्यत: हमारी हर ख़ुशी के पीछे कोई न कोई कारण होता है|</p>
<p>दूसरी ओर, अगर हम याद करें अपना बचपन, तब हमारे पास न धन था, न कोई पद था, न सम्मान था, न सफलता थी; ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके कारण हम आज खुश होते हैं| वास्तव में, हम हर छोटी से छोटी चीज के लिए अपने माँ-बाप पर, अपने अध्यापकों पर और अपने से बड़ों पर निर्भर थे| हर छोटे से छोटे काम के लिए हमें उनसे आज्ञा लेनी होती थी| वास्तव में, उनकी आज्ञा के बिना हम कुछ भी तो नहीं कर सकते थे| परन्तु तब भी हम खुश थे| अगर हम अपने जीवन में खोजें, तो अधिकतर लोगों का अनुभव है कि हमारे जीवन का सबसे खुशहाल समय हमारा बचपन था| आश्चर्य की बात है कि बचपन में हमारे पास कोई भी तो कारण नहीं था खुश होने का, फिर भी हम सबसे ज्यादा खुश थे|</p>
<p>इसका तो अर्थ यह हुआ कि हम किसी ऐसी खुशी से परिचित थे, जो किसी भी कारण पर निर्भर नहीं थी| जिसके लिए न धन कि आवश्यकता थी, न पद की, न प्रतिष्ठा की, न सम्मान की, न सफलता की और न ही किसी और कारण की|</p>
<p>ख़ुशी कहीं हमारे भीतर से ही आ रही थी| संतों ने इस ख़ुशी को <strong>आनंद </strong>कहा है| <strong>आनंद अर्थात अकारण ख़ुशी</strong>; एक ऐसी ख़ुशी जिसके पीछे कोई कारण नहीं| आनंद हमारे भीतर है| आनंद हमारा स्वभाव है|</p>
<p>जब हमारा ध्यान, हमारी चेतना स्वयं में स्थित होती है तो हम आनंद का अनुभव करते है, शांति का अनुभव करते हैं|</p>
<p><strong><u>सफलता हमारे बाहर है </u></strong></p>
<p>हमारी मौलिक आवश्यकता है आत्मनिर्भरता|</p>
<p>जैसे जैसे हम बड़े होते हैं हमें आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से आत्मनिर्भर बनना है| स्वयं को आजीविका कमाने के लिए तैयार करना है| अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें अपने पैरों पर खड़े होना है| हमें जीवन के हर क्षेत्र में सफल होना है| धन, पद, मान, प्रतिष्ठा हासिल करनी है, जिसके लिए संसार की दौड़ शुरू होती है| ४-५ वर्ष की उम्र आते आते हम स्कूल जाना शुरू कर देते हैं| और फिर कॉलेज फिर यूनिवर्सिटी, व्यवसाय आदि की दौड़ में जिंदगी भागने लगती है| अथक प्रयास और कठोर परिश्रम के पश्चात, हम सफल हो जाते हैं| हम वह सब पा लेते हैं जो हमने चाहा था| धन कमा लेते हैं, पद और प्रतिष्ठा हांसिल कर लेते है, बड़ा मकान बना लेते हैं, सुन्दर गाडी खरीद लेते हैं| यानी सभी सुख सिविधाओं का आयोजन कर लेते हैं, आत्म्निभर बन जाने हैं और सफल हो जाते हैं|</p>
<p>जिन्दगी में सफल होने के लिए, आत्मनिर्भर बनने के लिए, हमारी उर्जा, हमारे ध्यान, हमारी चेतना को स्वयं से बाहर, संसार की यात्रा करनी होती है| और जितना ज्यादा हमारी चेतना संसार में जायेगी, हम उतना ही सफल हो पायेंगे|</p>
<p><strong><u>चेतना की दो दिशायें </u></strong></p>
<p>यानी जब हमें सफल होना है तो हमारी चेतना को बाहर संसार में जाना होगा और जब हमें आनंद और शांति में डूबना है तो हमारी चेतना को स्वयं के भीतर आना होगा| आनंद बाहर नहीं है और सफलता भीतर नहीं है|</p>
<p>सफलता और आनंद में चुनाव संभव नहीं है| जीवन में सफलता और आनंद, दिन और रात के समान हैं| काम करने के लिए, आजीविका कमाने के लिए, मेहनत करने के लिए हमें दिन भी चाहिए और विश्राम करने के लिए, नींद के लिए हमें रात भी चाहिए| जिस प्रकार रात का विश्राम हमे अगले दिन काम करने की शक्ति देता है| उसी प्रकार जब हम आनंद और शान्ति में डूबते हैं, तो हम सफलता की यात्रा के लिए शक्ति एकत्रित कर पाते हैं|</p>
<p>कल्पना करें कि अगर हमारे जीवन में सिर्फ आनंद और शांति ही हो और हम सफल न हों, आत्मनिर्भर न हों, तो ऐसी जिन्दगी भी अधूरी होगी| और अगर हमारी जिन्दगी में सिर्फ सफलता हो, धन के अम्बार लगे हों, परन्तु शांति और आनंद न हो, तो ऎसी जिन्दगी भी अधूरी होगी|</p>
<p>जीवन में सफलता और आनंद, दोनों का बराबर महत्व है|</p>
<p>इसके लिए आवश्यक है कि हमारी चेतना की यात्रा सरल और सुगम हो| जितनी सुगमता से हमारी चेतना संसार में जाए सफलता और आत्मनिर्भरता के लिए; उतनी ही सुगमता से हमारी चेतना स्वयं के भीतर आ पाए आनंद और शांति के लिए| तभी हम जीवन में सफलता और आनंद, दोनों को अनुभव कर सकते है| हमारी चेतना की यात्रा उतनी ही सुगम हो जितनी सुगमता से सुबह हम आपने घर से अपने कार्यस्थल पर जाते है, और उतनी ही सुगमता से शाम को हम अपने घर भी वापस आ जाते हैं| इसी प्रकार, जब आवश्यकता हो तो हमारी चेतना इतनी ही सुगमता से संसार में जा सके और जब आवश्यकता हो तो उतनी ही सुगमता से स्वयं के भीतर आनंद में आ सके|</p>
<p><strong><u>चेतना के मार्ग में अटकाव</u></strong></p>
<p>हमारे जीवन में जहाँ पीड़ा है, चिंता है, परेशानी है या तनाव है; वहाँ हमारा ध्यान, हमारी चेतना अटक जाती है| अपने अनुभव से समझने की कोशिश करते हैं| हमें सामान्यत: अपने शारीर का बोध नहीं होता| हमें अपने सिर का पता तब चलता है जब सिर में दर्द होता है, अन्यथा हमारा ध्यान सिर की ओर नहीं जाता| उसी प्रकार हमें अपने पेट का पता तभी चलता है जब भूख लगी हो अथवा ज्यादा भरा हो, अन्यथा हमें अपने पेट का बोध ही नहीं होता|</p>
<p>अतः जहाँ पीड़ा है, चिंता है, तनाव है, परेशानी है वहीँ हमारा ध्यान, हमारी चेतना अटक जाती है| जिस वजह से हमारी चेतना स्वयं के भीतर नहीं पहुँच पाती और आनंद को, जो कि हमारा स्वाभाव है, जो कि हमारे भीतर है, अनुभव नहीं कर पाती|</p>
<p>हमने ऊपर जाना कि जीवन में सफलता और आनंद दोनों आवश्यक है जिसके लिए हमारी चेतना को सुगमता से भीतर और बाहर की यात्रा करनी होती है|</p>
<p><strong><u>पहला अटकाव – संसार </u></strong></p>
<p>जब चेतना बाहर से भीतर की ओर यात्रा करती है तो पहला पड़ाव है संसार के लोग| यानी हमारा परिवार, हमारे प्रियजन, हमारे मित्र, हमारे पडोसी, हमारे सहपाठी या सहकर्मी| यही हमारा समाज है, यही हमारा संसार है| यदि हमारे सम्बन्ध इनके साथ मधुर हैं तो हमारी चेतना सुगमता से इसको पार करके और भीतर चली जाती है| किन्तु अगर हमारे सम्बन्ध कटु हैं तो यह हमारी चेतना के लिए पहला अटकाव है|</p>
<p>आज ज्यादातर संबंधों से मधुरता लुप्त हो गई है — चाहे वह पति-पत्नी के सम्बन्ध हो, पिता-पुत्र के सम्बन्ध हों या अपने सहकर्मियों के साथ हों| हमारा सारा ध्यान, हमारी सारी चेतना वहां अटक कर रह जाती है| और इस कारण भीतर की यात्रा पर नहीं जा पाती|</p>
<p><strong><u>दूसरा अटकाव – शरीर </u></strong></p>
<p>जब चेतना और भीतर की ओर यात्रा करती है तो अगला पड़ाव है हमारा शरीर| यदि हमारा शरीर स्वस्थ है, कोई तकलीफ नहीं है तो चेतना सुगमता से शरीर के पार चली जाती है| किन्तु यदि हमारा शरीर अस्वस्थ है, कहीं दर्द है, भारीपन है, पीड़ा है तो यह हमारी चेतना के लिए दूसरा अटकाव है|</p>
<p>आज सफल होने की दौड़ में हम अपने शरीर पर ध्यान नहीं दे पाते और बहुत कम उम्र में ही हम बिमार पड़ जाते हैं| फिर हमारा सारा ध्यान, हमारी चेतना हमारे शरीर पर ही अटक कर रह जाती है| जिसके कारण हमारी चेतना भीतर की यात्रा नहीं कर पाती|</p>
<p><strong><u>तीसरा अटकाव – हमारे विचार </u></strong></p>
<p>जब चेतना और भीतर की ओर यात्रा करती है तो अगला पड़ाव है हमारी बुद्धि| हमारी बुद्धि का काम है विचार करना, सही और गलत में भेद करना, ऐसे निर्णय लेना जो हमें सफलता के मार्ग पर अग्रसर करें| सफल होने का अर्थ है निर्णय लेना| हम जितने ज्यादा निर्णय लेते हैं, उतने ही सफल होते है| अगर हमारे निर्णय लेते समय कोई चिंता नहीं है तो हमारी चेतना सुगमता से और भीतर की यात्रा पर चली जाती है| परन्तु यदि हमें कोई चिंता है, तनाव है, सही और गलत का निर्णय नहीं कर पाते तो यह हमारी चेतना के लिए तीसरा अटकाव है|</p>
<p>आज का मनुष्य औरों से आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा के कारण तनावग्रस्त है, चिंतित है, परेशान है| सारा दिन हम सोचते रहते हैं कि क्या करें, क्या न करें| इसके कारण चेतना हमारे विचारों पर अटक कर रह जाती है और भीतर की यात्रा नहीं कर पाती|</p>
<p><strong><u>चौथा अटकाव – हमारी भावनायें</u></strong></p>
<p>जब चेतना और भीतर की और यात्रा करती है तो अगला पड़ाव है हमारा हृदय| हमारा हृदय जहां हमारी सारी भावनाएं है, हमारे सारे अनुभव है, हमारे सारे भय है| अगर हमारा हृदय प्रेमल है, भयमुक्त है तो हमारी चेतना सुगमता से और भीतर की यात्रा पर चली जाती है| परन्तु यदि हम भय से ग्रस्त है तो यह हमारी चेतना के लिए चौथा अटकाव है|</p>
<p>आज बहुत से लोगों का हृदय भय से ग्रस्त है| ऐसी बहुत सी यादों से भरा है जिसको वह चाह कर भी भुला नहीं पाता| वे बुरी यादें, दुखद अनुभव उसकी चेतना को अटका कर रखते हैं और जैसे जैसे हमारी उम्र बडती है, हमारे दुखों का पहाड़ भारी और भारी होता जाता है तथा हमारी चेतना और भीतर की यात्रा नहीं कर पाती|</p>
<p><strong><u> </u></strong></p>
<p><strong><u> </u></strong></p>
<p><strong><u>चेतना की मंजिल – आत्मा  </u></strong></p>
<p>चेतना की मंजिल है अपनी आत्मा| जब हमारी चेतना अपनी आत्मा में डूब पाती है, अपने स्वयं में आ पाती है तभी वह विश्राम कर पाती है, आनंद और शांति अनुभव कर पाती है| यह तभी संभव है जब चेतना सभी पडावों को पार कर सके और सभी अट्कावों से मुक्त हो सके|</p>
<p>जब यह वापसी का मार्ग सुगम हो जाता है तो जब चाहे हमारी चेतना संसार में जा सकती है और जब चाहे वापस अपने स्वयं में आ सकती है| यानी हम सफलता और आनंद दोनों को प्राप्त कर सकते है|</p>
<p><strong><u>आज की वास्तविकता – सफलता महँगी कीमत पर</u></strong></p>
<p>अथक प्रयास और कठिन परिश्रम से हम सफल तो हो जाते हैं, परन्तु दुर्भाग्यवश, सफलता को पाने की दौड़ में हम पाते हैं कि हमारा स्वास्थ, हमारा परिवार, हमारे प्रियजन, हमारे मित्र, हमारा आनंद, हमारी ख़ुशी, हमारी शांति – सब पीछे कहीं दूर छूट गए| हम सफल तो हुए परन्तु साथ ही हम तनाव, अशांति, चिंता, अवसाद और रोगों से घिर गए; हम सफल तो हुए परन्तु हमारे परिवार और प्रियजनों के साथ हमारे सम्बन्ध कटु हो गये; हम सफल तो हुए परन्तु आनंद, शांति, और उत्सव से दूर हो गए| अब हमें खुश होने के लिए भी किन्ही कारणों की आवश्यकता पड़ती है|</p>
<p>यह सफलता हमें मिली हमारे स्वास्थ्य की कीमत पर, हमारे संबंधो की कीमत पर, हमारे आनंद की कीमत पर| हम सफल तो हुए परन्तु इस सफलता के लिए हमने बहुत बड़ी कीमत चुकाई| यह सफलता सस्ती नहीं है| और अगर सफलता के लिए हमें यह कीमत चुकानी पड़े, तो प्रश्न उठता है, “क्या हम वास्तव में सफल हुए”?</p>
<p><strong><u>सफलता पर विजय</u></strong></p>
<p>अगर थोडा भी विवेकपूर्ण विचार करेंगे तो न तो इतनी महंगी सफलता हम स्वयं के लिए चाहेंगे और न ही अपने बच्चों और प्रियजनों के लिए| हमें सफल तो होना है, परन्तु हम इस सफलता के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने को बिलकुल भी राजी नहीं है|</p>
<p>अगर हमें सफलता अपने स्वास्थय, संबंधो, आनंद और शांति की कीमत पर मिले तो सफलता हम पर विजयी हो गई| और अगर हम बिना इस कीमत के सफल होते हैं, तभी हम कह सकते हैं कि हमने सफलता पर विजय हांसिल की|</p>
<p><strong><u>क्या सफलता पर विजय संभव है?</u></strong></p>
<p>तो प्रश्न उठता है कि क्या सफलता पर विजय संभव है? क्या हम ऐसा जीवन जी सकते है जिसमें हम सफल भी हों, जीवन में सभी सुख सुविधायें हों और साथ ही हमारे सम्बन्ध मधुर हों, शरीर स्वस्थ हो, बुद्धि तीक्षण हो, ह्रदय प्रेमल हो और चेतना ध्यानस्थ हो|</p>
<p>जी हाँ, जीवन में “सफलता पर विजय” संभव है| और यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ|</p>
<p>परमात्मा के आशीर्वाद से और अपने सदगुरुओं की कृपा से, इस जीवन की पाठशाला में जो मैंने सीखा और अनुभव कर खरा पाया, उसके आधार पर मैंने “सफलता पर विजय” नामक 6 दिवसीय ट्रेनिंग कार्यक्रम बनाया है|</p>
<p>यदि आप अपने जीवन में सफलता पर विजय हांसिल करना चाहते हैं, अथवा अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, तो मैं आपको “सफलता पर विजय” नामक ट्रेनिंग के लिए प्रेमपूर्ण आमंत्रण देता हूँ| और विशवास दिलाता हूँ कि यह 6 दिन आपके जीवन को रूपांतरित कर देंगे|</p>
<p>यदि किसी मित्र के कोई प्रश्न हैं तो मुझे संपर्क कर सकते हैं,</p>
<p>डॉ. पंकज गुप्ता</p>
<p>&nbsp;</p>
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			</item>
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		<title>छात्रों की बढती आत्महत्याएँ: अभिभावक कितने जिम्मेवार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[conquerthesuccess]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Sep 2018 11:23:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Hindi]]></category>
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					<description><![CDATA[26 जुलाई 2018, दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में गुरुवार को सुबह 11: 30 बजे VIPS कॉलेज की सातवीं मंजिल से कूदकर वरीशा नाम की लड़की ने खुदकुशी कर ली। वरीशा ने LLB की थी और यहां LLM के लिए अप्लाई किया था| 26 जुलाई 2018, कॉलेज के शौचालय में छात्रा ने आत्महत्या की, पुलिस ने  [...]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><em>26 </em></strong><strong><em>जुलाई </em></strong><strong><em>2018</em></strong><em>, </em><em>दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में गुरुवार को सुबह </em><em>11: 30 </em><em>बजे </em><em>VIPS </em><em>कॉलेज की सातवीं मंजिल से कूदकर वरीशा नाम की लड़की ने खुदकुशी कर ली। वरीशा ने </em><em>LLB </em><em>की थी और यहां </em><em>LLM</em> <em>के लिए अप्लाई किया था|</em><em><br />
<strong>26</strong></em> <strong><em>जुलाई </em></strong><strong><em>2018</em></strong><strong><em>,</em></strong> <em>कॉलेज के शौचालय में छात्रा ने आत्महत्या की, पुलिस ने शुरू की जांच|</em><em><br />
<strong>18 </strong></em><strong><em>जुलाई </em></strong><strong><em>2018</em></strong><em>: </em><em>नौवीं कक्षा के छात्र ने हॉस्टल में की खुदकुशी, पिता ने जताई साजिश की आशंका।</em><em><br />
<strong>14 </strong></em><strong><em>जून </em></strong><strong><em>2018</em></strong><em>: </em><em>मध्यप्रदेश में </em><em>रैगिंग </em><em>से परेशान एमबीबीएस छात्र ने फांसी लगाकर जान दी</em><em>|</em><em><br />
<strong>30 </strong></em><strong><em>मई </em></strong><strong><em>2018</em></strong><em>: </em><em>सीबीएसई क्लास </em><em>10 </em><em>रिजल्ट: खराब रिजल्ट आने से निराश </em><em>2 </em><em>छात्रों ने की खुदकुशी</em><em>|</em><em><br />
</em><br />
आज अखबार इस तरह के दुखद समाचारों से भरे पड़े हैं। आज भारत वर्ष में हर 55 मिनट में एक छात्र आत्महत्या कर रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सन् 2007 से 2016 तक लगभग 75,000 छात्रों ने आत्महत्या की है। प्रतिवर्ष आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही हैं। 2014 में 8060 छात्रों ने आत्महत्या की थी; 2015 में संख्या बढ़ कर 8934 हो गयी और वर्ष 2016 में 9474 छात्रों ने आत्महत्या की। यानी हर 55 मिनट में भारत में एक छात्र आत्महत्या कर रहा है। जब मैं इस तरह के समाचार सुनता हूं तो मुझे बहुत दुख होता है| मैंने इस विषय पर बहुत सोचा की बच्चे आत्महत्या क्यों कर रहे हैं, और क्या किया जा सकता है अपने बच्चों को आत्महत्या से रोकने के लिए| समस्या इतनी गंभीर और विकराल है कि कोई भी माता-पता पूर्ण विशवास से नहीं कह सकता कि कल उसका बच्चा आत्महत्या नहीं करेगा; क्यूंकि जो बच्चा आज आत्महत्या कर रहा है, उसके अभिभावक भी बच्चे की इस भावना से अनजान हैं|</p>
<p><strong>छात्रों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण उनके माता-पिता हैं|</strong> और वह इसलिए क्योंकि जब एक बच्चा आत्महत्या करता है तो सबसे ज्यादा अगर कोई दुखी होता है तो वह हैं उसके माता-पिता। बाकी लोगों के लिए यह एक आंकड़ा है; एक समाचार है; उससे जादा कुछ नहीं| मैं नहीं जानता कि छात्रों की आत्महत्या में स्कूल/ कॉलेज जिम्मेवार हैं या नहीं; सरकार जिम्मेवार है या नहीं; सिक्षा पद्धति जिम्मेवार है या नहीं| मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि कोई भी माता-पिता इतना शक्तिशाली नहीं कि वह समाज व्यवस्था को बदल सके और न ही इतना शक्तिशाली है कि अपने जवान बच्चे की लाश तो अपने कंधे पर उठा सके| परन्तु हर माता-पिता इतना सक्षम अवश्य हैं कि वह अपने बच्चों की परवरिश में यथासंभव सुधार ला सकें ताकि वे अपने बच्चे को आत्महत्या से बचा सकें|</p>
<p>समाचारों से ऐसा लगता है कि जो बच्चे अपने जीवन में असफल हो जाते हैं, वही आत्महत्या करते हैं| थोड़ा गहराई से देखने की कोशिश करते हैं| किसी भी कंपटीशन एग्जाम में, चाहे वह इंजीनियरिंग हो, मेडिकल हो, सिविल सर्विसेस हो अथवा कोई और, सफल बच्चों कि संख्या 8% से 10% ही होती है| उदहारण के लिए अगर मेडिकल में लगभग 6 लाख बच्चे बैठते हैं तो सिर्फ लगभग 52 हजार सीटें ही हैं-  यानी 8% बच्चे ही सफल हो सकते हैं| और सभी परीक्षाओं की भी लगभग यही हालत है। यानी सभी कम्पटीशन एग्जाम में कुल मिलाकर 25% से 30%  बच्चे ही सफल हो सकते हैं— अर्थात 70% बच्चे तो हर हाल में असफल होंगे| लेकिन ख़ुशी कि बात यह है कि सभी 70% बच्चे, जो असफल हुए, वे आत्महत्या नहीं कर रहे| इसका अर्थ यह हुआ कि हो सकता है असफलता भी एक कारण हो परंतु उससे बड़े कुछ और कारण भी हैं|</p>
<p><strong>मुझे जो सबसे बड़ा कारण नजर आता है, वह है बच्चों और उनके माता-पिता के बीच बिगड़ते संबंध</strong>| मैं एक काउंसलर हूँ और जब मेरे पास माता-पिता अपने बच्चे की काउंसलिंग के लिए आते हैं तो लगभग सभी का कहना होता है कि हम अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं, परन्तु बच्चे हमारी बात नहीं मानते, हमारी इज्ज़त नहीं करते| आज की तो जनरेशन ही बिगड़ी हुई है| जैसा मैंने कहा कि मैं एक काउंसलर हूँ, स्कूल और कॉलेज में बच्चों को ट्रेनिंग देता हूँ और मोटिवेशनल स्पीकर हूँ; अतः मुझे बच्चों के साथ रहने का और उनसे रूबरू बात करने का अवसर मिलता है| आइए हम एक बच्चे की नजर से देखते हैं कि वह अपने मां-बाप के प्यार को किस तरह से महसूस करता हैं:</p>
<ul>
<li>ग्यारहवीं कक्षा के एक छात्र का कहना है कि हमारे माता-पिता हमें प्यार नहीं करते| वे जो हम पर पैसा खर्च करते हैं, पढ़ाई में, ट्यूशन इत्यादि में, वह अपने अहंकार की पुष्टि के लिए करते हैं| वे चाहते हैं कि हम सफल हो ताकि वे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में सीना ठोक कर कह सकें कि हमने अपने बच्चों को इंजीनियर बना दिया|</li>
<li>वही एक दूसरे छात्र का कहना है कि मेरे पापा कहते हैं चाहे कुछ भी हो जाए तुम्हें 12वीं में हर हाल में 95% से ज्यादा नंबर लाने हैं; क्योंकि तुमने देखा, तुम्हारे ताऊ की बेटी पिछले साल 6% नंबर लाइ थी, अब तुम्हारे अगर 95% से कम नंबर आये तो मेरी नाक कट जाएगी।</li>
<li>पापा मुझसे बात नहीं करते| उन्होंने कहा है जब तक इंजीनियरिंग में एडमिशन नहीं हो जाता तब तक वह मुझसे बात नहीं करेंगे|</li>
<li>जब हम 4 घंटे लगातार पड़ते हैं, तो हमारे माता-पिता की नजर हम पर नहीं जाती| परंतु जैसे ही हम TV चलाते हैं या मोबाइल हाथ में लेते हैं तभी वे लेक्चर देना शुरु कर देते हैं| क्या हम 24 घंटे पढ़ सकते हैं?</li>
<li>आप मेरे पापा को थोड़े दिन के लिए ले जाओ और उनको अच्छे पापा बना कर ले आओ|</li>
<li>मेरे माता-पिता ने आज तक मुझे कभी “बेटा” नहीं कहा, न कभी गले लगाया और न ही कभी शाबाशी दी|</li>
</ul>
<p>ऐसी बहुत सी बातें है जो बच्चे अपने माता-पिता के विषय में मुझे बताते हैं| अगर आप ऐसा समझते हैं कि आप एक अपवाद हैं, आपके बच्चे आपसे खुश हैं; तो कृपया एक बार विचार करें कि क्या आपने उन्हें अपनी नाराजगी व्यक्त करने की स्वतंत्रता दी है| कल्पना करें कि यदि आपका बच्चा आपकी गलती निकालेगा तो क्या आप अपनी कमियों या गलतियों को सहर्ष स्वीकार कर पायेंगे? हर मां बाप अपने बच्चों में संस्कार डाल देते हैं कि बुरी बात नहीं करनी, किसी को बुरा नहीं कहन| माता-पिता की इज्ज़त करनी चाहिए| अर्थात यदि मेरा बच्चा अगर किसी बात से मुझसे नाराज है तो उसको वह नाराजगी व्यक्त करने का न अधिकार है और न ही माहोल| यह बात हर बच्चा बहुत अच्छे तरीके से समझता है| और माता-पिता इस गलतफहमी में रहते हैं कि हमारे बच्चे हमसे बहुत खुश हैं| और बदकिस्मती से यह गलतफहमी तब टूटती है जब बच्चे की आत्म्हत्या की खबर आती है|</p>
<p>कुछ बातों से समझते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश में क्या गलतियां करते हैं|</p>
<ul>
<li>अक्सर छोटे बच्चे अपने मां-बाप से बहुत सवाल पूछते हैं, अपनी ओर माता-पिता का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं| माता-पिता को लगता है कि बच्चा उनको परेशान कर रहा है| परेशानी से बचने के लिए सबसे आसान तरीका लगता है कि वह बच्चे को TV में कार्टून या मोबाइल दे देते हैं गेम्स खेलने के लिए| और यही मां-बाप बच्चों के बड़े होने पर शिकायत करते नजर आते हैं कि मेरा बच्चा सारा दिन टीवी और मोबाइल में लगा रहता है, हमारे साथ न बैठता है और न बात करता है| कौन हैं जिम्मेवार?</li>
<li>बहुत बार ऐसा देखा जाता है कि जब घर में सब लोग खाना खा चुके होते हैं उसके बाद बच्चा बोलता है मम्मी मुझे भूख लगी है या आज कुछ नया मजेदार बनाओ, और क्योंकि मां के पास समय नहीं है या वह अपने दिन के काम से थक गई है तो उनको कोल्ड ड्रिंक, चाकलेट, बिस्कुट या बाज़ार से कुछ मंगा कर खाने के लिए दे देती हैं| बाद में यही माता-पिता शिकायत करते हैं कि हमारे बच्चे बाहर का खाना खाते हैं और घर का खाना उन्हें पसंद नहीं है, जिसके कारण इनका वजन बढ़ता जा रहा है और स्वास्थ्य खराब हो रहा है| कौन हैं जिम्मेवार?</li>
<li>हम सिखाते हैं कि माता-पिता की इज्ज़त करनी चाहिए और अपने माता-पिता की इज्जत करना भूल जाते हैं| जब बच्चे अपने माता-पिता द्वारा अपने दादा-दादी का अपमान होता देखते हैं, तो वह भी यही करते हैं| और बाद में यही माता-पिता शिकायत करते हैं कि बच्चे उनकी इज्जत नहीं करते|कौन है जिम्मेवार?</li>
<li>हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि सब से प्यार करो परंतु यदि हमारा बच्चा कभी जमीन पर गिर जाता है या मेज, कुर्सी से टकरा जाता है तो हम उसको एक जोर का चांटा लगाते हैं और बच्चों को कहते हैं कि देखो हमने जमीन की पिटाई कर दी या कुर्सी को मार दिया| यानी हम उसे प्रेम करना नहीं अपितु बदला लेने कि भावना सिखा रहें हैं| कल को बच्चा यदि क्रोधी हो जाता है, तो कौन हैं जिम्मेवार?</li>
<li>जब माता-पिता छोटे बच्चों को क्रेच में या आया के भरोसे छोड़ कर पैसे कमाने जाते है तो बच्चे को सन्देश दे रहे हैं कि पैसा उससे ज्यादा मूल्यवान है| वही बच्चा अगर माता-पिता को वृधाश्रम में छोड़ आता है तो, कौन है जिम्मेवार?</li>
</ul>
<p>ऐसे अनगिनित उदाहरण हैं जिनसे हम समझ सकते हैं कि माता-पिता बच्चों की परवरिश में क्या गलतियां करते हैं| जरा सोचिये, ज्यादातर माता-पिता संतान उत्पात्ति क्यों करते हैं? वंश चलाने के लिए; या सम्भोग का आनंद लेना शारीरिक आवश्यता है और उसके प्रतिफल के रूप में बच्चा पैदा हो जाता है| कितने माता-पिता ऐसे होंगे जो दिल पर हाथ रख कह सकते हैं कि वे माता-पिता बनना चाहते थे, एक दिव्यात्मा को आमंत्रित करना चाहते थे, उसके लिए पूर्णरूप से तैयार थे और माता-पिता बनने के लिए वे सम्भोग में उतरे|</p>
<p>हम यह भूल जाते हैं कि बच्चे को जन्म देने से कोई मनुष्य माता-पिता नहीं बनता, यह तो केवल एक पाशविक प्रक्रिया और उपलब्धि है| जानवर भी सम्भोग का आनंद लेने के फलस्वरूप, बच्चे पैदा कर देते हैं|</p>
<p>बच्चों की सही परवरिश करके ही एक मनुष्य सही मायने में माता-पता बनता है| बच्चे को पालना एक साधना है, एक तपस्या है जिसके लिए एक ऐसे अथाह धर्य की आवश्यकता है जो उस मूर्तिकार में होता है जो पत्थर पर एक कोमल आघात करता है, पर ध्यान रखता है कि कहीं मूर्ति का अहित न हो जाए| और इस धर्य से मूर्तिकार अपनी कल्पना को पराकाष्ठा तक ले जाता है और जन्म लेती है एक सजीव मूर्ति| बच्चों की परवरिश करना भी करीब १८ से २0 साल की लम्बी, अथक तपस्या है| तभी एक बच्चा अपने पैरों पर खड़ा हो पाता है|</p>
<p>हम जब भी कभी जीवन में कोई नया काम करते हैं; कोई नयी नौकरी या व्यवसाय करते हैं या जहाँ भी पैसा कमाने या खर्च करने का अवसर होता है; हम अनेक बार स्वयं का मूल्यांकन करते हैं कि क्या हम तैयार है या नहीं| और अगर नहीं, तो पूरी तैयारी करने के बाद, ट्रेनिंग के बाद ही व्यवसाय में धन या श्रम लगाते हैं | परन्तु दुर्भाग्यवश, हम अभिभावक बनने से पहले कोई तयारी नहीं करते| हम नहीं देखते कि क्या हम बच्चों की परवरिश के लिए पूर्णतया तैयार हैं अथवा किसी ट्रेनिंग कि आवश्यकता है| क्या हमारे पास बच्चे को देने के लिए पूरा समय है या नहीं| आज की तेज रफ़्तार जिंदगी में, जहाँ दोनों माता-पिता काम कर रहे हैं, पैदा होने के सिर्फ कुछ महीनों के पश्चात बच्चे को आया के हवाले या क्रेच में छोड़ जाते हैं| हम यह भूल जाते हैं कि उस आत्मा को हमने ही आमंत्रित किया है अपने शरीर के द्वारा जन्म लेने के लिए, अपने परिवार में आने के लिए| जरा सोचिये, आपको कोई अपने घर आमंत्रित करता है और आप मेहमान बनते है| और अगर वह थोड़ी देर में, चाय नाश्ता करा कर, चलता बने कि अब आपका ख्याल आया रहेगी तो क्या आप उस घर में कभी मेहमान बनना चाहेंगे? क्या आप इसे अपनी बेइज़्जाती नहीं समझेंगे? परन्तु हम अपने बच्चों के साथ यही करते हैं और जरा भी उनकी बेईज्ज़ती का ख्याल नहीं आता|</p>
<p>क्या हम माता-पिता बनने से पहले जानते हैं कि पैदा होने से लेकर 20 वर्ष की उम्र तक बच्चे की शाररिक, मानसिक और मनोवाज्ञानिक आवश्यकतायें हर 2 से 3 साल में बदल जाती हैं| अज्ञान वश हमारा परवरिश का तरीका बच्चों की आवश्यकता अनुसार नहीं होता| हमें लगता है कि हम बच्चों को प्यार  कर रहे हैं, परन्तु बच्चा हमारे उस व्यवहार से घुट रहा है, दुखी हो रहा है| फिर बच्चों के साथ सम्बन्ध खराब हो जाते हैं | नतीजा आत्म्हात्यें|</p>
<p>प्रेम के नाम पर हम अपना तनाव, अपनी अतृप्त इच्छायें, अपनी कामनायें सब बच्चों पर थोपते जाते हैं| उनकी इच्छाओं का कोई मूल्य नहीं| वास्तव में, हम अपने बचपन और जवानी की भूलों को अपने बच्चों के द्वारा सुधारना चाहते हैं| याद रहें, कि प्रेम के नाम पर हम जितनी हिंसा अपने बच्चों के साथ करते हैं, उतनी हिंसा तो संसार में दुश्मनी के नाम पर भी नहीं होती|</p>
<p>मेरा हर माता-पिता से करबद्ध निवेदन है कि एक अच्छे माता-पिता बनने के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से तैयार करें, इस बात का निश्चय करें कि क्या वे अपने बच्चों की परवरिश के लिए 20 वर्ष की तपस्या के लिए तैयार हैं| और जब पायें कि वे तैयार हैं तभी एक दिव्यात्मा को अपने शरीर में आने का निमंत्रण दें| वरना आज ऐसे बहुत से गर्भनिरोध के सुलभ उपाय उपलब्ध हैं जिससे आप सम्भोग का भरपूर आनंद ले सकते हैं| माता-पिता बनने की कोई आवश्यकता नहीं है|</p>
<p>और यदि सभी माता-पता अच्छी परवरिश की ट्रेनिग लें; बच्चों की शारीरिक, मानसिक और मनोवाज्ञानिक आवश्यकताओं के अनुरूप (जो कि उम्र के साथ बदलती रहती है) व्यवहार करेंगे, तो आपके अपने बच्चों के साथ सम्बन्ध मधुर होंगे और मुझे विश्वास है कि फिर जीवन में कितनी भी असफलतायें सामने आये, कितनी भी प्रतिकूल परिस्थिति हो; आपके बच्चे पूर्णरूप में उनका सामना करेंगे और कभी भी आत्महत्या का विचार मन में नहीं लायेंगे|</p>
<p>मुझे जो ठीक लगता है, वह मैंने आपके साथ साझा किया| हो सकता है आप मेरे विचारों से सहमत न हों, परन्तु यह लेख एक प्रयास है कि आप सभी इस समस्या पर सोचने के लिए प्रेरित हों| मुझे पूरा विश्वास है कि यदि सभी मिल कर कोशिश करेंगे, तो हम अपने बच्चों को आत्महत्या रुपी राक्षस का ग्रास बन्ने से रोक पायेंगे और उन्हें एक खुशहाल भविष्य अवश्य दे पायेंगे|</p>
<p>अच्छे माता पिता कैसे बने, उसके लिए मेरा एक दिन का ट्रेनिग प्रोग्राम है जिसका नाम है “<strong>सनतराश”| </strong>इस ट्रेनिंग में नए पति पत्नी जो माता-पिता बनना चाह रहे हैं उनके लिए भी पूरा मार्गदर्शन है; और जो माता-पिता बन चुके हैं और अज्ञानवश बच्चों के साथ गलतियाँ कर चुके हैं उनके लिए भी मार्गदर्शन व सुधार करने के उपाए हैं| आप चाहें तो यह ट्रेनिंग कर सकते हैं | अगर आपके कोई प्रश्न है, तो आप मुझे संपर्क कर सकते हैं|</p>
<p>डॉ. पंकज गुप्ता</p>
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